करोना की कहर के बीच टिहरी डेम ने बदल दिया भारत की तस्वीर

आजादी के बाद देश में गरीबी, अशिक्षा, भूखमरी जैसी कई अहम समस्याएं या यू कहें की चुनौतियां थीं, जिनके पीछे एक सबसे बड़ी वजह आर्थिक विकास न होना था। 40 करोड़ों की आबादी के साथ देश को तरक्की के पथ पर आगे बढ़ाना मुश्किल था लेकिन भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई गई योजनाओं ने देश को नया आयाम दिया। तरक्की के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए बांध सबसे अहम साबित हुए, जिनकी जरिए ना केवल बाढ़ जैसी चुनौती से निपटा जा सका। बल्कि सिंचाई और देश में इंडस्ट्री के लिए पर्याप्त रूप से बिजली भी उपलब्ध हो सकी। इनके जरिए सिंचाई के लिए पानी मिल सका तो हरित क्रांति को सफल बनाया जा सका। इंडस्ट्री के लिए बिजली मिली तो भारत एक बड़ा इंडस्ट्रियल हब बनकर उभर सका, लेकिन कई अहम योजनाएं छह दशकों तक विवादों में फंसे रहने पर पूरी नहीं हुई, जिनका विपरित प्रभाव भी पड़ा। आईये जानते हैं ऐसे ही मुख्य बांधों के बारे में जिन्होंने देश की सूरत बदल दी।

डेम


सरदार सरोवर बांध चार राज्यों को दे रहा गति

निर्मदा नंदी पर बना यह देश का दूसरा सबसे बड़ा डैम है। वर्षों के आंदोलन और विरोध के बीच इस डैम को पूरा किया गया। 1960 में इसकी कार्य योजना बनीं। 138.90 मीटर ऊंचे इस डैम से राज्य राज्यों का बिजली मिली है। इनमें राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं। करीब 56 वर्षों में जाकर डैम को तैयार किय गया। इस दौरान लंबी चौड़ी अदालती लड़ाई भी लड़ी गई। करीब 65 हजार करोड़ की लागत से बने इस डैम से मध्यप्रदेश के 57, महाराष्ट्र की 27 और गुजरात को 16 फीसदी बिजली मिलती है। जबकि राजस्थान के हिस्से में महज पानी आता है। डैम के जलाशय का क्षेत्रफल भी करीब 37 हजार हेक्टेयर के आसपास है। इस परियोजना से 192 गांवों के करीब 40 हजार परिवार विस्थापित हुए,जिसके लेकर नर्मदा बचाओ आंदोलन भी मेधा पाटकर की अगुवाई में चलाया गया।

टिहरी डैम, जिसने बदल दी उत्तराखंड की तस्वीर

भागीरथी नंदी पर बना यह देश का सबसे ऊंचा डैम है। 261 मीटर ऊंचे इस डैम को दुनिया का पांचवां सबसे ऊंचा डैम भी माना जाता है। बांध के निर्माण को लेकर 1961 में प्रारंभिक जांच हुई और 1972 में इसकी इसकी रूपरेखा तैयार की गई लेकिन उसके बाद भी तैयार होने में लंबा समय लग गया। वर्ष 2006 में बनकर तैयार हुए इस डैम 2400 मेगावाट बिजली तैयार हो रही है। इस डैम को तैयार करने में केंद्र सरकार ने 75 और राज्य सरकार ने 25 प्रतिशत धनराशि खर्च की गई। एक हजार मेगावाट अधिक की क्षमता विकसित करने की दिशा में काम चल रहा है। इस डैम से उत्तर प्रदेश और दिल्ली को पेयजल की भी आपूर्ति होती है। पर्यावरणविद मानते हैं कि अगर यह डैम टूटा तो पश्चिम यूपी 10 से अधिक बड़े जिले तबाह हो जाएंगे, लेकिन यह भी सच्चाई है कि यह डम सिंचाई के साथ ही बड़ी ऊर्जा जरूरत को पूरा कर रहा है।